Thursday, March 7, 2019

WomensDay मोदी सरकार में महिलाएं क्या वाकई ज़्यादा सुरक्षित: रियलिटी चेक

दिल्ली की एक चलती बस में मेडिकल छात्रा के साथ हुए गैंगरेप और उसकी मौत के छह साल बीतने के बाद क्या भारत में महिलाओं के ख़िलाफ़ यौन हिंसा के मामले कम हुए हैं, क्या महिलाएं अब ज्यादा सुरक्षित हैं?

ये घटना 2012 में हुई थी. इस घटना को लेकर काफी विरोध प्रदर्शन भी देखने को मिला था, जिसके चलते महिलाओं की सुरक्षा का मुद्दा भारत में राजनीतिक मुद्दा बना था.

इस घटना के दो साल बाद भारत में बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार बनी, सरकार का दावा है कि उसने यौन हिंसा के मामलों पर अंकुश लगाने के लिए कड़े कदम उठाए हैं.

लेकिन विपक्षी कांग्रेस पार्टी के मुताबिक इन दिनों महिलाएं सबसे ज़्यादा असुरक्षित महसूस कर रही हैं.

हालांकि, अब यौन उत्पीड़न की पीड़िताएं कहीं ज़्यादा संख्या में शिकायत दर्ज कराने सामने आ रही हैं और बलात्कार के कुछ मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान भी किया गया है.

लेकिन, महिलाओं को अब भी शिकायत दर्ज कराने में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है और न्याय के लिए भी उन्हें इंतज़ार करना पड़ रहा है.

शिकायत दर्ज कराने के मामले बढ़े
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के 2016 तक के आंकड़ों के मुताबिक पुलिस के पास बलात्कार के मामले दर्ज कराने की संख्या बढ़ी है. 2012 के दिल्ली बस गैंगरेप की घटना के बाद इसमें आई तेजी को इस ग्राफ़ के जरिए देखा जा सकता है.

शिकायत दर्ज कराने की एक वजह तो लोगों में जागरूकता का बढ़ना भी है.

इसके अलावा पुलिस स्टेशनों में महिला पुलिस अधिकारियों की ज्यादा तैनाती और केवल महिला पुलिसवाले थानों से भी फर्क पड़ा है.

इसके अलावा आम लोगों के दबाव के चलते भी 2012 के बाद क़ानूनों में बदलाव हुए हैं.

बलात्कार की परिभाषा भी बदली है, जिसके बाद अब शरीर के किसी भी हिस्से के साथ यौन हरकत बलात्कार के दायरे में आ गया है.

इसके अलावा घूरने, अश्लीलता प्रदर्शित करने और एसिड अटैक करने जैसे अपराधों में भी 2013 के बाद कठोर दंड के प्रावधान किए गए हैं.

बीते साल, 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ बलात्कार के दोषियों को मौत की सजा का प्रावधान किया गया और 16 साल से कम उम्र की लड़कियों के साथ बलात्कार के मामले में अधिकतम सजा को बढ़ाया गया है.

हालांकि, इस बात के संकेत भी मिल रहे हैं कि यौन हिंसा के मामले अभी भी भारत में कम दर्ज होते हैं.

एक समाचार पत्र ने 2015-2016 के आधिकारिक आपराधिक आंकड़ों और राष्ट्रव्यापी फैमली हेल्थ सर्वे की मदद से ये दर्शाया है. इस सर्वे में महिलाओं से यौन हिंसा से जुड़े अनुभवों के बारे में पूछा गया था.

सर्वे में ये देखा गया कि कई यौन उत्पीड़न के मामले अभी भी दर्ज नहीं होते, क्योंकि ज़्यादातर मामलों में उत्पीड़न करने वाला पीड़िता का पति ही होता है.

क़ानून-व्यवस्था की मुश्किलें

यौन हिंसा की पीड़ित महिलाओं को समाज में अब भी भेदभाव और लांछन का सामना करना पड़ता है.

ह्यूमन राइट्स वाच की रिपोर्ट के मुताबिक लड़कियों और महिलाओं को अब भी पुलिस स्टेशन और अस्पतालों में अपमान सहना पड़ता है. इसके अलावा उन्हें ना तो अच्छी मेडिकल सुविधा मिलती है और ना ही उम्दा कानूनी सहायता.

2017 में भारत की एक अदालत का फैसला इसलिए भी चर्चा में आ गया था क्योंकि अदालत ने बलात्कार पीड़िता को इसके लिए स्वयं तैयार बता दिया था और उसके बीयर पीने और कमरे में कंडोम रखने की आलोचना भी की थी.

इसके अलावा एक बड़ा सवाल ये भी है कि जब बलात्कार के मामले दर्ज हो जाएं तो क्या महिलाओं को न्याय मिलने की उम्मीद बढ़ जाती है?

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक कांग्रेस नेतृत्व वाली 2009 से 2014 की यूपीए सरकार के दौरान बलात्कार के 24 से 28 फ़ीसदी मामलों में ही सजा हुई.

इस दर में मौजूदा बीजेपी नेतृत्व वाली सरकार के पहले तीन साल के दौरान कोई ख़ास अंतर नहीं दिखा है.

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